मै कौन हूँ ?

                                                                             सरहदों में बंधा हुआ

                                                                 गोरा या काला हूँ ,

                                                                    पता नहीं |

                                                                  हिन्दू हूँ या मुसलमान ,

या की क्रिस्तान|

मुखोटे के उपर मुखोटा

पुत्र  या  पिता हूँ

पति हूँ |

सेवक हू दास या पहरेदार

नेता या अभिनेता हूँ

मजदूर हु या मालिक

मै सब कुछ हू

इसी भ्रम में न जाने ,

युग युगांतर से

एक

 इन्सान

की अनवरत यात्रा

का

अविराम

सिल सिला जारी है

यह जानने के लिए

की मै कौन हूँ |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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क्षमा

 विविधता सृजन में
निहित है दो मन ।
खुशी और आनंद
लेने में सक्षम
संतुलन की मौजूदगी में
अभिव्यक्ति के खुलते
है प्रेम द्वार निर्बाध
समता ,बंधुत्व प्रेम
,बड़ जाता है दून |
, बड जाती दूरियां,
बिना क्षमा के मन
मैला ही रह जाता
न धरा को चैन , ,
न सुकून गगन पाता |
आशीष मांगे मन
ऐसे ही खिलते रहे चमन ,
सदा हर दिल क्षमा प्रार्थी
बन अंतर्मन से करे क्षमादान |
युग की चुनोतिया कर रही
ग्लानियो से मुक्ति का आव्हान |
दो दिलो के सवांद
देश काल वर्तमान
की अनिवार्य विकल्प् हो तुम |

यात्री रुक जाना नही

  1. पड़ाव बहुत लुभावने है

  2. पड़ाव बहुत लुभावने है 
    मन बरबस रुकने को ;
    एक पल के लिए स्तब्ध
    मौन अड़ियल रुख लिए
    संसारी मोह बंधन में
    आसक्त अपने चिरपरिचित
    मार्ग में अवरोध
    की बिसात लिए टक्कर
    देने को उद्दत अपनी
    सुसज्जित मण्डली के साथ
    पर तू चेत संभल और चल
    संभल संभल धीरे धीरे
    कदम बड़ा कि तेरी
    मंजिल बाट जोहती है |WP_20170403_07_44_51_Pro

नजरअंदाज करना आसान  है दिन को ,

इतने सारे लोग हैं हमारे पास क्योकि

आश्चर्य ,अफ़सोस ,कुछ भी तो नहीं .,
आपकी कृति आपके दिन के हिसाब से
तय करती है आपका दर्जा ,मंजिल |
वे सब तरीके जिनकी आपको जरुरत है
सभी दिनों के संचय के लिए |
कल्पना ,सपना .उत्साह और साहस
आपके दिन को बनाते है सुखमय |
सपने भी जीवन पाते है दिन के साये में
हर दिन जो सूक्ष्म जगत की भांति
हरेक के जीवन में करता है काम |
बुरे दिन और अच्छे दिन ,
हर दिन अपने अंदाज में जिए |
क्या सन्डे और मंडे |

तू नांच

साँची कहूँ तू नाच
सृजन के लिए नाच पिया
तब ही बने सारी बात पिया
तू नाच हाँ नाच मिल के नाच
समझे नाचे नहीं तो बांचे नहीं
पिया नांच ओ पिया नाच |
मान सांच मान साँच मान साँच
सृजन के लिए नवजीवन के लिए
बिना नाच बने नहीं कोई काज
इत नांच उत नाच तू नांच नांच |
जो नाचे सो बांचे ,कह मोहन सांच
न रोग सताए न ताप तू नांच हाँ नांच
बिन नांच न बंधे सर ताज ,बाबा नांच |
हो सके तू आज नांच नांच नांच

बिना पानी के

बिना पानी के

मन रे मान तू पानी का मान
पानी बिना सारा जग सुनसान,
कहा है ये ज्ञानियों ने जान,|
जैसा पीओ पानी वैसे निकले वाणी |
निकले जब पानी तो ख़तम जिंदगानी |
गर हो सके तो अपना बचा लीजिये पानी |
वर्ना समझ लीजिये हो जावोगे बेपानी |

शांति कहाँ हो ?

शांति कहाँ है ?

ओह तुम राजदरबार में भी हो नहीं
अफ़सोस////////////////////
न संत समाज में पता तुम्हारा
तुम बेगैरत हो व्यर्थ ही तलास में
वक्त गुजार दिया सानिध्य पाने की
लालसा ने स्वर्णिम जीवन उजाड़ दिया
काश तुम होती ,व्यर्थ उठापटक न होती
तुम कल्पना हो ,सिर्फ कल्पना
दिलासा देने के लिए काफी है ,
नाम तुम्हारा काश तुम होती